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सतना में सिमटते रास्ते, बढ़ता संकट; दबंगई और सौदों के बीच घुटता आम आदमी का हक

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Published On: 10 January 2026

सतना के शहरी इलाकों में सार्वजनिक रास्तों पर कब्जे का चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। जिन गलियों और रास्तों से कभी लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही होती थी, वे अब दीवारों और ताले के पीछे कैद हो रहे हैं। कई परिवारों के सामने स्थिति यह बन गई है कि घर तो उनका है, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता किसी और के कब्जे में चला गया है। दबंगई और डर के चलते कई लोग चुप रह गए, लेकिन कुछ परिवारों के लिए यह लड़ाई मजबूरी बन चुकी है।

जहां आने-जाने का कोई वैकल्पिक मार्ग मौजूद होता है, वहां मामला अदालतों में लंबा खिंच सकता है। जिन बस्तियों में केवल एक ही रास्ता है, वहां संकट गंभीर हो जाता है। बच्चों का स्कूल जाना, बुजुर्गों का अस्पताल पहुंचना और रोजमर्रा की जरूरतें तक प्रभावित होने लगी हैं। ऐसे मामलों में प्रशासन से त्वरित फैसले की अपेक्षा की जाती है, क्योंकि रास्ता रुकना सीधे जीवन रुकने जैसा है।

सतना में सिमटते रास्ते

धवारी क्षेत्र में सामने आया विवाद अब पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गया है। यहां आम रास्ते की जमीन पर निर्माण कर उसे बंद किए जाने की शिकायत के बाद तहसीलदार ने स्थगन आदेश जारी किया था। आदेश के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। बताया जा रहा है कि दो दर्जन से अधिक परिवारों का आवागमन पूरी तरह अवरुद्ध हो चुका है। पीड़ितों ने तहसीलदार के साथ-साथ आयुक्त तक गुहार लगाई है।

रजिस्ट्रियों में दर्ज

प्रभावित परिवारों का कहना है कि आराजी नंबर 647 से उनका पारंपरिक रास्ता दर्ज है। मूल भूमि स्वामी ने जब अलग-अलग लोगों को जमीन बेची, तब रजिस्ट्रियों में स्पष्ट रूप से रास्ते का उल्लेख किया गया था। इसके बावजूद हालिया सौदों के बाद उसी रास्ते को निजी बताकर बंद किया जा रहा है, जिससे लोगों में आक्रोश है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि हाल में आराजी का एक हिस्सा खरीदने के बाद रास्ते वाली जमीन को अलग व्यक्ति को बेच दिया गया। इसके बाद से निर्माण कर रास्ता अवरुद्ध किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि वर्षों से यही एकमात्र रास्ता था और इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग मौजूद नहीं है।

कानून क्या कहता है?

कानूनी जानकारों के अनुसार आम रास्ते पर कब्जा करना अपराध की श्रेणी में आता है। भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के साथ-साथ मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट प्रावधान हैं। प्रशासन चाहे तो अवैध निर्माण हटाकर रास्ता बहाल कर सकता है। अब सवाल यह है कि क्या कार्रवाई होगी या सार्वजनिक रास्ते यूं ही निजी संपत्ति बनते रहेंगे।

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