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नवजात मौतों पर सख्ती: हर एसएनसीयू डेथ का ऑडिट अनिवार्य, संक्रमण नियंत्रण में एआई तकनीक पर जोर

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Published On: 21 February 2026

नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को लेकर जिला प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। कलेक्टर कार्यालय में 20 फरवरी को आयोजित जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए गए कि विशेष नवजात देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में होने वाली प्रत्येक मृत्यु का विस्तृत डेथ ऑडिट किया जाए। बैठक में कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने स्वास्थ्य योजनाओं की समीक्षा करते हुए कहा कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधार प्रशासन की प्राथमिकता है।

निर्देशों के अनुसार, ऑडिट केवल अस्पताल में हुई घटना तक सीमित नहीं रहेगा। गर्भावस्था के दौरान आई जटिलताएं, हाई रिस्क प्रेग्नेंसी, समय पर जांच की स्थिति और प्रसव के दौरान उत्पन्न समस्याएं भी रिपोर्ट का हिस्सा होंगी। उद्देश्य यह है कि मौत के वास्तविक कारणों की पहचान कर भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। अधिकारियों से कहा गया कि रिकॉर्ड संधारण में किसी तरह की ढिलाई न बरती जाए।

नवजात मौतों पर सख्ती

बैठक में ऑपरेशन थिएटर और लेबर रूम में संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था को और मजबूत करने पर जोर दिया गया। कलेक्टर ने निर्देश दिए कि तय चेकलिस्ट का सख्ती से पालन किया जाए और एआई आधारित तकनीक अपनाने की संभावनाएं तलाशी जाएं। उनका कहना था कि तकनीक के उपयोग से मानवीय त्रुटियां कम होंगी और प्रसव या सर्जरी के दौरान होने वाली जटिलताओं पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।

टीकाकरण और हाई रिस्क गर्भवती पर फोकस

टीकाकरण अभियान की प्रगति की भी समीक्षा की गई। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि लाभार्थियों से नियमित फीडबैक लिया जाए और एएनसी पंजीयन बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाए। हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं की समय पर पहचान कर जरूरत पड़ने पर तुरंत रेफरल की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया। सुरक्षित प्रसव सेवाओं को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया।

बुजुर्गों और पोषण सेवाओं की समीक्षा

बैठक में होप कार्यक्रम के तहत चिन्हित 902 वृद्धजनों की स्थिति पर भी चर्चा हुई। इनमें से 560 को नर्सिंग अधिकारियों द्वारा घर जाकर सेवाएं दी जा चुकी हैं। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्गों को तय अंतराल पर घर पर स्वास्थ्य सहायता दी जा रही है। जिला पोषण समिति की समीक्षा में स्वास्थ्य और महिला एवं बाल विकास विभाग को समन्वित प्रयास करने के निर्देश दिए गए, ताकि मातृ और शिशु पोषण में सुधार हो सके।

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