सुप्रीम कोर्ट ने धार भोजशाला मामले में गुरुवार को अहम आदेश जारी करते हुए बसंत पंचमी (23 जनवरी) को दोनों समुदायों को धार्मिक गतिविधियों की अनुमति दी है। कोर्ट ने हिंदू पक्ष को सूर्योदय से सूर्यास्त तक मां सरस्वती (वाग्देवी) की पूजा की पूरी छूट दी है, जबकि मुस्लिम पक्ष को दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक जुमे की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दोनों गतिविधियां तय समय और निर्धारित स्थान पर शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हों।
सुप्रीम कोर्ट ने जिला प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि दोनों समुदायों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित किए जाएं और प्रवेश के लिए विशेष पास व्यवस्था लागू की जाए। कोर्ट ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए कड़े सुरक्षा इंतजाम करने को कहा है। धार जिले में एहतियात के तौर पर करीब 8,000 पुलिसकर्मी और अधिकारी तैनात किए गए हैं।
धार भोजशाला विवाद
अदालत के आदेश के अनुसार, हिंदू समुदाय को प्रत्येक मंगलवार सूर्योदय से सूर्यास्त तक परिसर में निःशुल्क प्रवेश की अनुमति रहेगी। इस दौरान आगंतुक केवल सीमित पूजन सामग्री जैसे एक-दो फूल और कुछ चावल के दाने ले जा सकेंगे। अन्य दिनों में यह परिसर पर्यटकों के लिए खुला रहेगा, जहां प्रति व्यक्ति 1 रुपए प्रवेश शुल्क निर्धारित किया गया है। 15 वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रवेश निःशुल्क रहेगा।
हिंदू पक्ष का पक्ष
सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से कहा गया कि बसंत पंचमी के दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा, हवन और पारंपरिक अनुष्ठान किए जाएंगे। यह भी बताया गया कि हाल के वर्षों में बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ने के कारण विशेष व्यवस्थाओं की आवश्यकता रही है।
मुस्लिम पक्ष का रुख
मुस्लिम पक्ष ने अदालत को भरोसा दिलाया कि दोपहर 1 से 3 बजे के बीच जुमे की नमाज अदा करने के बाद परिसर को खाली कर दिया जाएगा। हालांकि, नमाज के समय में बदलाव के सुझाव को मुस्लिम पक्ष ने खारिज करते हुए कहा कि जुमे की नमाज का समय बदला नहीं जा सकता। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य प्रशासन की ओर से कोर्ट को आश्वस्त किया गया कि पूर्व वर्षों की तरह इस बार भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी तैयारी की गई है। प्रशासन की योजना है कि आगंतुकों की संख्या नियंत्रित रखने और भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष पास जारी किए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों समुदायों से आपसी सम्मान, सहिष्णुता और शांति बनाए रखने की अपील की है। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक परंपराओं का पालन कानून और व्यवस्था के दायरे में रहकर किया जाना चाहिए, ताकि समाज में सौहार्द बना रहे।
