देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) के बहुप्रतीक्षित मेडिकल कॉलेज प्रोजेक्ट को आखिरकार राज्य सरकार से हरी झंडी मिल गई है। सरकार ने इस परियोजना के लिए इसेंसिएलिटी सर्टिफिकेट जारी कर दिया है, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) के पास औपचारिक आवेदन भी जमा कर दिया है। करीब 25 वर्षों से लंबित यह सपना अब जमीन पर उतरने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
यह परियोजना वर्ष 2001 से इंदौर के छोटा बांगड़दा क्षेत्र में प्रस्तावित थी। उस समय विश्वविद्यालय के पास लगभग 50 एकड़ जमीन उपलब्ध थी, लेकिन समय के साथ यह घटकर करीब 12 एकड़ रह गई। मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए तय मानकों के अनुसार पर्याप्त भूमि अनिवार्य है, जिसके अभाव में प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सका। जमीन की इसी कमी ने दो दशकों तक योजना को फाइलों में ही रोके रखा।
DAVV
विश्वविद्यालय प्रशासन ने हाल के वर्षों में इस प्रोजेक्ट को नई दिशा देने का प्रयास किया। कुलपति प्रो. राकेश सिंघई की पहल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की रुचि के बाद इसे झाबुआ स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया। उद्देश्य केवल जमीन की उपलब्धता नहीं, बल्कि पिछड़े और आदिवासी बहुल क्षेत्र में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं और मेडिकल शिक्षा पहुंचाना भी है। झाबुआ में पर्याप्त भूमि उपलब्ध होने से एनएमसी के मानकों को पूरा करना आसान होगा।
आदिवासी क्षेत्र को मिलेगा बड़ा लाभ
झाबुआ जैसे जिले में मेडिकल कॉलेज खुलने से स्थानीय युवाओं को चिकित्सा शिक्षा के नए अवसर मिलेंगे। साथ ही क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर भी सुधरेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल कॉलेज और संबद्ध अस्पताल खुलने से आसपास के जिलों को भी लाभ मिलेगा और गंभीर मरीजों को बड़े शहरों की ओर रुख नहीं करना पड़ेगा।
इसेंसिएलिटी सर्टिफिकेट मिलने के बाद अगला महत्वपूर्ण चरण एनएमसी की स्वीकृति है। यदि निरीक्षण और प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती है, तो आने वाले शैक्षणिक सत्रों में यहां प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो सकती है। विश्वविद्यालय प्रशासन को उम्मीद है कि वर्षों से अटकी यह योजना अब अंतिम मंजिल तक पहुंचेगी।
