वाराणसी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट का एक हिस्सा हाल ही में जमींदोज कर दिया गया है। यह वही घाट है, जिसका निर्माण 1771 में देवी अहिल्याबाई होलकर ने कराया था। करीब 254 साल पुरानी इस ऐतिहासिक संरचना को श्मशान घाट से जुड़े एक विकास प्रोजेक्ट के तहत तोड़ा गया है। जैसे ही यह जानकारी सामने आई, देवी अहिल्याबाई के वंशजों और समाज के विभिन्न वर्गों में नाराजगी देखने को मिल रही है।
बताया जा रहा है कि मणिकर्णिका घाट क्षेत्र में लगभग 18 करोड़ रुपए की लागत से विकास कार्य प्रस्तावित हैं। इस परियोजना के तहत कुल 29,350 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्माण कराया जाना है। चूंकि घाट का यह इलाका गंगा किनारे स्थित है और मिट्टी दलदली प्रकृति की है, इसलिए बाढ़ के खतरे को देखते हुए 15 से 20 मीटर गहराई तक पाइलिंग कराई गई है। अधिकारियों के मुताबिक सख्त मिट्टी तक पाइलिंग का काम किया गया है, ताकि भविष्य में किसी तरह की क्षति न हो।
वाराणसी देवी अहिल्याबाई ट्रस्ट
मणिकर्णिका घाट का यह हिस्सा देवी अहिल्याबाई होलकर की संपत्तियों की देखरेख के लिए गठित खासगी देवी अहिल्याबाई होलकर चैरिटीज ट्रस्ट की निगरानी में रहा है। ट्रस्ट के अध्यक्ष यशवंतराव होलकर ने इस पूरे मामले को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि घाट का ऐतिहासिक स्वरूप बिना समुचित परामर्श और संवेदनशीलता के नुकसान पहुंचाया गया।
यशवंतराव होलकर ने बयान जारी कर कहा कि विकास कार्यों से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी दूरदर्शी शासिका की बनाई गई विरासत को सुरक्षित रखते हुए ही काम होना चाहिए था। उनका कहना है कि घाट का यह हिस्सा न सिर्फ धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
PM और CM से की शिकायत
ट्रस्ट की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इस पूरे मामले की जांच की मांग की गई है। ट्रस्ट ने लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई, हटाई गई मूर्तियों को ट्रस्ट को सौंपने और उनका विधिवत पुनः प्रतिष्ठापन कराने की अपील की है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं वाराणसी से सांसद हैं और उन्होंने वर्ष 2023 में इस परियोजना का भूमिपूजन किया था।
संरक्षण बनाम विकास की बहस फिर तेज
इस घटना के बाद एक बार फिर विकास और विरासत संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस छिड़ गई है। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का कहना है कि आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों की मूल पहचान को बचाए रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
