इंदौर में लागू पुलिस कमिश्नरी प्रणाली के तहत सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के अधिकार देने के मामले में हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। डबल बेंच ने राज्य शासन के गृह विभाग के सचिव, इंदौर पुलिस कमिश्नर समेत सभी डीसीपी और एसीपी को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
यह याचिका एडवोकेट सौरभ त्रिपाठी द्वारा जनहित में दायर की गई है। गुरुवार को वे स्वयं कोर्ट में उपस्थित हुए और याचिका का पक्ष रखा। उनके साथ एडवोकेट मयंक शर्मा ने भी पैरवी की। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 1 जुलाई 2024 से लागू नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Indian Civil Security Code) ने पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह ले ली है और इसके अनुसार केवल पुलिस अधीक्षक (SP) या समकक्ष रैंक के अधिकारी ही विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त किए जा सकते हैं।
इंदौर पुलिस
याचिका में कहा गया कि वर्तमान में इंदौर पुलिस कमिश्नरी में एसीपी स्तर के अधिकारी ये कार्यवाही कर रहे हैं। जबकि एसीपी आम तौर पर पुलिस उपाधीक्षक (DSP) रैंक के होते हैं और एसपी रैंक से नीचे आते हैं। एडवोकेट मयंक शर्मा ने तर्क दिया कि नई संहिता के लागू होने के बाद एसीपी द्वारा मजिस्ट्रेट के रूप में आदेश पारित करना अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इसे अवैध माना जाना चाहिए।
अधिकार का विवाद
याचिका में यह भी कहा गया कि एसीपी स्तर के अधिकारियों द्वारा व्यक्तियों को जेल भेजने और अन्य मजिस्ट्रेटीय आदेश पारित करना विधिक रूप से सही नहीं है। कोर्ट में दलील दी गई कि यह न केवल संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के मानकों के खिलाफ भी है। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की कि इस विषय में स्पष्ट निर्देश दिए जाएं और केवल योग्य रैंक के अधिकारियों को ही मजिस्ट्रेटीय कार्यवाही करने की अनुमति हो।
आगे की सुनवाई
हाई कोर्ट ने सभी संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है और मामले की विस्तृत सुनवाई तय की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि याचिका में कही गई बातें सही साबित होती हैं तो यह पुलिस कमिश्नरी प्रणाली में एसीपी के अधिकारों की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसले का रास्ता खोल सकती है।
