रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में पदस्थ कुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर शुक्रवार को MP हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ में की गई। अदालत ने राज्य सरकार को जवाब प्रस्तुत करने के लिए चार सप्ताह की अंतिम मोहलत देते हुए स्पष्ट किया कि निर्धारित समयसीमा में जवाब दाखिल करना अनिवार्य होगा। कोर्ट के इस रुख को मामले की गंभीरता से जोड़कर देखा जा रहा है।
यह याचिका एनएसयूआई के जिला अध्यक्ष सचिन रजक द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने कुलगुरु की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि चयन में निर्धारित नियमों और मापदंडों का पालन नहीं किया गया। अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता उत्कर्ष अग्रवाल ने पक्ष रखा और नियुक्ति प्रक्रिया को नियम विरुद्ध बताया।
MP सरकार को अंतिम मोहलत
याचिका में कहा गया है कि नियमानुसार पीएचडी उपाधि प्राप्त करने के बाद कम से कम 10 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव आवश्यक होता है। आरोप है कि प्रो. राजेश वर्मा की नियुक्ति के दौरान इस शर्त का पालन नहीं किया गया। साथ ही, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यताओं की अनदेखी किए जाने का भी दावा किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि मूल रूप से प्राध्यापक पद पर नियुक्ति ही नियमों के विपरीत है, तो कुलगुरु पद पर नियुक्ति स्वतः ही अवैध मानी जानी चाहिए।
राज्य सरकार ने मांगा समय
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता वेद प्रकाश तिवारी उपस्थित रहे। राज्य पक्ष ने जवाब दाखिल करने के लिए समय की मांग की। अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि प्रतिवादियों को 7 अप्रैल 2025 को नोटिस तामील किया जा चुका है, लेकिन अब तक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया। इस पर कोर्ट ने चार सप्ताह का अंतिम अवसर देते हुए जवाब दाखिल करने के निर्देश जारी किए।
23 मार्च को अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को निर्धारित की गई है। यह याचिका कुलगुरु की पूर्व प्राध्यापक नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया में कथित विसंगतियों पर केंद्रित है। अब निगाहें राज्य सरकार के जवाब और अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां मामले की दिशा तय हो सकती है।
