MP की संस्कारधानी जबलपुर एक बार फिर ओशो (Osho) की आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो गई है। 11 से 15 दिसंबर तक चलने वाले जन्मदिवस समारोह में देश-विदेश से सैकड़ों अनुयाई शहर पहुंचे हैं। वह स्थान जहां कभी रजनीश ओशो ने मौलश्री वृक्ष के नीचे गहन साधना की थी, इस समय श्रद्धा और ध्यान की अनुभूति से भरा हुआ है। इस वर्ष आयोजन की खास बात यह रही कि कथावाचक मुरारी बापू भी ओशो जन्मोत्सव में शामिल होने जबलपुर पहुंचे।
रामकथा के सिलसिले में पिछले कुछ दिनों से जबलपुर में ठहरे मुरारी बापू शुक्रवार को भंवरताल पार्क स्थित उस ऐतिहासिक मौलश्री वृक्ष के नीचे पहुंचे, जहां ओशो ने ध्यान किया था। यहां उन्होंने वृक्ष का प्रतीकात्मक रूप से नामकरण करते हुए इसे ‘ओशो ट्री’ घोषित किया। इस दौरान जबलपुर महापौर भी उनके साथ मौजूद रहे। आसपास मौजूद कई ओशो भक्त वृक्ष से लिपटकर ध्यान में लीन नजर आए। कई अनुयायियों ने कहा कि वे हर वर्ष इसी स्थान पर आकर ओशो के बताए मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प दोहराते हैं।
बोधि वृक्ष बुद्ध
मुरारी बापू ने कहा कि जैसे बोधि वृक्ष बुद्ध से प्रकाशित हुआ, उसी प्रकार मौलश्री वृक्ष ओशो की साधना का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि वे वर्षों से दुनिया भर में रामकथा करते हुए कई बार ओशो के विचारों का उल्लेख कर चुके हैं। बापू ने कहा कि इस स्थान पर बैठते ही एक अनूठी शांति महसूस होती है, जैसे स्वयं प्रकृति ध्यान में डूबी हो। पुणे की मां धन्यरूपा सहित कई देशों अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और इटली से आए अनुयायियों ने कहा कि ओशो के विचार उनके जीवन की दिशा बदल देते हैं। उन्होंने बताया कि ध्यान और संन्यास की प्रक्रिया में ओशो की शिक्षाएं कई उलझनों को स्वतः समाप्त कर देती हैं। शहर के देवताल स्थित ओशो अमृत धाम में भी जन्मोत्सव का वातावरण चरम पर है, जहां रोजाना विशेष ध्यान सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।
अगर आप तुलना करना छोड़ दें तो निश्चित ही ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है।
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नगर निगम ने किया संरक्षण
जबलपुर महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू ने बताया कि नगर निगम ने ओशो से जुड़े इस मौलश्री वृक्ष का विशेष संरक्षण किया है। उन्होंने कहा कि जिस पथ से होकर ओशो अपने निवास से इस वृक्ष तक आया-जाया करते थे, उसे भी मुरारी बापू ने ‘ओशो साधना पथ’ नाम से अभिषिक्त किया है। जन्मोत्सव के चलते जबलपुर इन दिनों अध्यात्म, ध्यान और आस्था का संगम बन गया है। देश-विदेश से आए लोग ओशो की चेतना को महसूस करते हुए यहां ठहर रहे हैं। शहर के लिए यह आयोजन केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विरासत का उत्सव बन गया है।
