सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि केवल गलत या त्रुटिपूर्ण न्यायिक आदेश के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। यह फैसला न्यायपालिका में स्वतंत्रता और निष्पक्षता की रक्षा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
निर्भय सिंह सुलिया को वर्ष 2014 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, खरगोन के पद से बर्खास्त किया गया था। उन पर भ्रष्टाचार और आबकारी मामलों में जमानत याचिकाओं पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप था। कहा गया था कि 50 बल्क लीटर से अधिक शराब की जब्ती वाले कुछ मामलों में उन्होंने जमानत दी, जबकि अन्य मामलों में उसी आधार पर जमानत अस्वीकार की।
सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
हाई कोर्ट ने विभागीय जांच के आधार पर उन्हें बर्खास्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को अनुचित ठहराते हुए कहा कि 27 साल तक बेदाग सेवा देने वाले जज को बिना ड्यू प्रोसेस अपनाए हटाना न्यायसंगत नहीं है। जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह स्पष्ट किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल जजमेंट एरर और भ्रष्टाचार को एक नहीं माना जा सकता। गलत आदेश या निर्णय की त्रुटि पर तात्कालिक कार्रवाई न्यायिक स्वतंत्रता और विवेकाधिकार को कमजोर कर देती है। कोर्ट ने हाई कोर्ट को सतर्क रहने की सलाह दी।
प्रशासनिक दबाव
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि प्रशासनिक कार्रवाई के डर से निचली अदालतें कई योग्य मामलों में जमानत देने से बचती हैं। इसके कारण याचिकाएं उच्च अदालतों तक पहुंचती हैं। हाई कोर्ट को जिला न्यायाधीशों की दबावपूर्ण परिस्थितियों को समझते हुए ठोस आधार के बिना कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ झूठी और निराधार शिकायतों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि शिकायतकर्ता वकील है, तो मामला बार काउंसिल को भेजा जाए।
