उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में गर्भगृह प्रवेश को लेकर साधु-संतों और पुजारियों के बीच विवाद गहराता जा रहा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी महाराज ने हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, जिला प्रशासन और महाकाल मंदिर प्रशासक को पत्र लिखकर मांग की थी कि मंदिर में नियुक्त पुजारियों के प्रतिनिधियों की संख्या की लिखित जानकारी परिषद को दी जाए। साथ ही उन्होंने मुख्य पुजारी घनश्याम शर्मा को छोड़कर अन्य पुजारियों और उनके प्रतिनिधियों के गर्भगृह में प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की थी। उनका तर्क था कि अधिक संख्या में प्रतिनिधियों के प्रवेश से गर्भगृह की मर्यादा भंग होती है और अव्यवस्था फैलती है।
महंत रविंद्र पुरी के पत्र के जवाब में महाकाल विद्वत परिषद और अखिल भारतीय युवा ब्राह्मण समाज ने संयुक्त रूप से तीखी प्रतिक्रिया दी है। संगठनों ने कहा कि महाकाल मंदिर के नियम मंदिर समिति द्वारा बनाए गए हैं और पवित्रता, ड्रेस कोड तथा गर्भगृह में ले जाने वाली वस्तुओं से जुड़ी परंपराएं प्राचीन और स्थापित हैं। इन नियमों का पालन देश के आम नागरिक के साथ-साथ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी करते हैं। इसलिए साधु-संतों को अलग नियमों के दायरे में रखना उचित नहीं है।
उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर
महाकाल विद्वत परिषद ने अपने पत्र में अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पद को लेकर भी सवाल उठाए। परिषद ने पूछा कि क्या केंद्र या राज्य सरकार ने महंत रविंद्र पुरी को परिषद अध्यक्ष होने का कोई प्रमाण पत्र प्रदान किया है। साथ ही मांग की गई कि सरकार और प्रशासन यह जांच करें कि कितने अखाड़ों का समर्थन वास्तव में उन्हें प्राप्त है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि तीन रामादल अखाड़ों को परिषद से बाहर किए जाने के बाद अखाड़ा परिषद अधूरी हो गई है। यदि रामादल की तीनों इकाइयों और 500 खालसा ने मिलकर अलग अखाड़ा परिषद बना ली, तो उस स्थिति में क्या होगा, यह सवाल पुजारी संगठनों ने उठाया है।
विवाद का राजनीतिक
मंदिर के गर्भगृह प्रवेश को लेकर यह विवाद न केवल धार्मिक दृष्टि से संवेदनशील है, बल्कि इसमें प्रशासनिक और सामाजिक प्रभाव भी दिखाई दे रहे हैं। दोनों पक्षों की स्थिति स्पष्ट है अखाड़ा परिषद सुरक्षा और मर्यादा के लिए प्रवेश सीमित करना चाहती है, जबकि पुजारी संगठनों का तर्क है कि स्थापित नियमों और परंपराओं का पालन सभी को समान रूप से करना चाहिए। वर्तमान में मामला प्रशासन और सरकार के संज्ञान में है। आगामी दिनों में पक्षों के बीच संवाद और हल निकालने की प्रक्रिया पर नजर रहेगी।
