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महाकाल महोत्सव के तीसरे दिन सोना महापात्रा की शिव-भक्ति प्रस्तुति, जनजातीय नृत्यों से सजेगा महाकाल लोक

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Published On: 15 January 2026

महाकाल महोत्सव के तीसरे दिन शुक्रवार को संगीत और आस्था का विशेष संगम देखने को मिलेगा। मुंबई की प्रसिद्ध गायिका सोना महापात्रा शिव भक्ति पर आधारित संगीतमय प्रस्तुति देंगी। उनके कार्यक्रम में शिव गाथा, लोक-संगीत और समकालीन धुनों का अनूठा मेल होगा, जो श्रोताओं को आध्यात्मिक अनुभूति से जोड़ देगा। आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं और संगीत प्रेमियों में खास उत्साह देखा जा रहा है।

महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति और संस्कृति संचालनालय, मध्यप्रदेश शासन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित महाकाल महोत्सव के तहत महाकाल लोक में भव्य सांस्कृतिक आयोजन किया जा रहा है। इस मंच पर जनजातीय लोकनृत्य, पारंपरिक लोककलाएं और संगीतमय प्रस्तुतियां दर्शकों को भारतीय संस्कृति की विविधता से रूबरू कराएंगी। आयोजन का उद्देश्य लोक परंपराओं को सहेजना और उन्हें व्यापक मंच देना है।

महाकाल महोत्सव

महोत्सव के तीसरे दिन जनजातीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं, लोकजीवन और आस्था से जुड़े रंग मंच पर दिखाई देंगे। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए जनजातीय कलाकार पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्य यंत्रों और पारंपरिक तालों के साथ नृत्य प्रस्तुत करेंगे। ये प्रस्तुतियां दर्शकों को जनजातीय समाज की जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ेंगी। सभी कार्यक्रमों की शुरुआत शाम 7 बजे से होगी।

आकर्षण का केंद्र

शुक्रवार को गोंड जनजातीय करमा नृत्य उपेंद्र सिंह और साथी (सीधी), बैगा जनजातीय परधौनी नृत्य दयाराम और साथी (डिंडौरी), अहिराई नृत्य कमलेश नामदेव और साथी (गोटगांव) तथा भारिया जनजातीय सैताम नृत्य अंकिता और साथी (छिंदवाड़ा) द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा। हर नृत्य अपनी अलग पहचान और भावभूमि के साथ दर्शकों को आकर्षित करेगा।

कला यात्रा

महोत्सव के अंतर्गत प्रतिदिन कला यात्रा भी निकाली जा रही है। शुक्रवार को इस यात्रा में मटकी लोकनृत्य की प्रस्तुति मधुरी ढोड और साथी (उज्जैन) देंगे। यह कला यात्रा शास्त्री नगर से नीलगंगा चौराहे, हाट बाजार होते हुए महाकाल लोक पहुंचेगी। रास्ते भर लोकनृत्य और संगीत के रंग बिखरेंगे, जिससे पूरा शहर सांस्कृतिक उत्सव में डूबा नजर आएगा।

आस्था और संस्कृति का उत्सव

महाकाल महोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बन रहा है, बल्कि यह लोककला और जनजातीय संस्कृति को नई पहचान देने का भी माध्यम है। शिव भक्ति, संगीत और नृत्य के इस संगम से उज्जैन में उत्सव का माहौल और अधिक जीवंत हो गया है।

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