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महाकाल के दर पर पहुंचीं शिल्पा-शमिता: शयन आरती में बहनों की आस्था, उज्जैन में दिखा भक्तिभाव

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Published On: 11 January 2026

उज्जैन की पावन धरती पर शनिवार रात आस्था और श्रद्धा का विशेष दृश्य देखने को मिला, जब फिल्म जगत की जानी-मानी अभिनेत्रियां शिल्पा शेट्टी और शमिता शेट्टी भगवान महाकालेश्वर के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचीं। दोनों बहनों ने रात की शयन आरती में शामिल होकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। महाकाल मंदिर पहुंचने के बाद दोनों अभिनेत्रियों ने शयन आरती में भाग लिया। मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार और आरती की दिव्य ध्वनि के बीच उन्होंने बाबा महाकाल की आराधना की। इस दौरान मंदिर का वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।

शिल्पा और शमिता के मंदिर पहुंचते ही परिसर में मौजूद श्रद्धालुओं में खास उत्साह नजर आया। दर्शन के दौरान लोग उन्हें देखने और पल भर की झलक पाने को उत्सुक दिखाई दिए। हालांकि, मंदिर प्रशासन की व्यवस्थाओं के चलते दर्शन और आरती का क्रम शांतिपूर्वक संपन्न हुआ।

मंदिर प्रबंधन की ओर से स्वागत

महाकाल मंदिर प्रबंध समिति की ओर से सहायक प्रशासक हिमांशु कारपेंटर ने दोनों अभिनेत्रियों का स्वागत किया। उन्होंने उन्हें मंदिर की परंपराओं और दर्शन व्यवस्था की जानकारी दी। अभिनेत्रियों ने भी मंदिर में की गई व्यवस्थाओं की सराहना की। दर्शन के बाद शिल्पा शेट्टी ने अपनी भावना साझा करते हुए कहा कि महाकाल के दर्शन किसी योजना से नहीं, बल्कि बाबा के बुलावे से होते हैं। उन्होंने बताया कि अचानक मन में उज्जैन आने की तीव्र इच्छा हुई और ऐसा लगा जैसे बाबा ने स्वयं बुलाया हो। इसी भाव के साथ वे तुरंत उज्जैन पहुंच गईं।

शयन आरती को बताया अविस्मरणीय अनुभव

शिल्पा शेट्टी ने शयन आरती के अनुभव को बेहद खास बताते हुए कहा कि इसकी अनुभूति को शब्दों में बांध पाना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि आरती के समय जो ऊर्जा और शांति महसूस हुई, वह अद्भुत थी और वे भविष्य में दोबारा दर्शन के लिए अवश्य आएंगी। शमिता शेट्टी के लिए यह महाकालेश्वर मंदिर की पहली यात्रा थी। उन्होंने कहा कि लंबे समय से यहां आने की इच्छा थी और अब जाकर लगा कि बाबा का बुलावा आ गया है। दर्शन के बाद उन्हें भीतर से शांति और सकारात्मकता का अनुभव हुआ।

दोनों बहनों ने मंदिर दर्शन के बाद कहा कि महाकालेश्वर मंदिर में आकर एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति होती है। उन्होंने न सिर्फ पूजा-अर्चना की, बल्कि इस पावन स्थल की ऊर्जा को भी महसूस किया। श्रद्धा, शांति और विश्वास के साथ वे उज्जैन से विदा हुईं।

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