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25 अक्टूबर से शुरू हो रही छठ पूजा, सूर्य देव को अर्घ्य देने का पवित्र पर्व; जानिए इतिहास और पारंपरिक विधि

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Published On: 24 October 2025

छठ पूजा जो दीपावली के 6 दिन बाद मनाई जाती है, भारत और नेपाल के कुछ हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व है। छठ पूजा केवल एक पर्व नही है, बल्कि लोगों के परिवार और समाजिक बंधनों को भी जोड़ता है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में प्रसिद्ध है और चार दिनों तक चलता है। इस साल छठ पूजा 25 अक्टूबर से शुरू होकर 28 अक्टूबर तक मनाई जाएगी। छठ पूजा भगवान सूर्य को समर्पित है और कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक मनाई जाती है। छठ पूजा के दौरान व्रती सूर्योदय और सूर्यास्त के समय नदी या तालाब के किनारे जल चढ़ाते हैं, निर्जल व्रत रखते हैं, प्रसाद बनाते हैं और विभिन्न पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, जो इसे अत्यंत पवित्र और अनोखा पर्व बनाते हैं।

इस साल छठ पूजा 25 अक्टूबर शनिवार से शुरू होकर 28 अक्टूबर मंगलवार तक मनाई जाएगी। यह चार दिवसीय पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है और इसमें महिलाएं व्रत रखकर सूर्य भगवान की उपासना करती हैं।

छठ पूजा का इतिहास

छठ पूजा का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है और इसे सबसे पहले माता सीता ने किया था। माना जाता है कि जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण 14 वर्षों के वनवास से लौटे थे, तब माता सीता ने मुद्गल ऋषि के आश्रम में छह दिनों तक सूर्य देव की पूजा की, ताकि रावण वध के पाप से मुक्ति मिल सके। इसके अलावा, महाभारत में भी इसका उल्लेख मिलता है, जहां भगवान सूर्य के पुत्र कर्ण ने जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया और द्रौपदी ने अपने पति पांडवों के लिए इस पूजा का आयोजन किया, जिससे उन्हें अपना खोया हुआ राज्य वापस मिला।

महत्व

छठ पूजा एक कठिन व्रत है, जिसमें व्रति को 72 घंटे तक निर्जला रहना पड़ता है और डूबते व उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए ठंडे पानी में घंटों खड़ा रहना होता है। इस व्रत में पवित्रता और निष्ठा का विशेष महत्व है, क्योंकि नियमों का उल्लंघन पूरे व्रत को प्रभावित कर सकता है। धार्मिक महत्व के साथ-साथ छठ पूजा एक सामाजिक उत्सव भी है, जो लोगों को एक साथ लाता है और प्रकृति के प्रति सम्मान व कृतज्ञता का प्रतीक है। इसे मनाने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति का विश्वास माना जाता है।

पारंपरिक विधि

  • छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, जिसमें व्रति विशेष भोजन बनाकर उसे ग्रहण करती हैं।
  • इसके बाद, खरना में छठ माता की पूजा की जाती है।
  • संध्या में व्रति सूर्य को अर्घ्य अर्पित करती हैं और अगले दिन सुबह फिर से अर्घ्य देने के बाद व्रत का समापन होता है।
  • यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि परिवार और समाजिक बंधनों को भी जोड़ता है।
  • छठ पूजा के हर नियम और रिवाज में श्रद्धा और भक्ति झलकती है, जो मानवता और एकता का प्रतीक है।
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